असल मेरे ख्याल से उसूल
का बिगड़ा रूप है
असल में आप वो नहीं जो
आपके के भीतर का स्वरूप है
ज़माने को न देखो
की वह कैसा है
इस कलयुग में
बाप बेटे जैसा है
यारों
लोगों ने तो गाँधी तक को नहीं बख्शा
देखने में गाँधी नज़र आयेंगे
भीतर झांक कर देखोगे तो
उनमें समाये नाथू-राम नज़र आयेंगे
इस ज़माने में
वो हर चीज़ असली नहीं है
मंजिल आज है तो कल नहीं है
वो इंसान नहीं है,
जिसके दिलमें थोड़ा दर्द नहीं है
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