खामोश रहकर भी
,जुबां चलती है
आपसे दूर रहकर भी ,मेरी
इन्तहा होती है
कौन जाने जिंदगी का दस्तूर
कहा ले जाये
गम के शाम में भी खुशी की
सुबह मचलती है
खामोश................
आपके होने का एहसास
ही काफी हो जाता है
गम में खुद को समाने
से
दर्द का एहसास खुद व् खुद काफूर हो जाता है
आपके ख्यालों के उजालों में नहाने से
खामोश
.................
चाहे लाख कोशिश कर लो
फिर भी बारिकिओं को को ही
पकड़ पाओगे
दुबकी जो लगाई इसमें तो
खुद- का नया अवतार ही देख
पाओगे
ख़ामोशी.........................
हर पल इसका इल्म अलग होता है
गम और खुशी का जुना
होता है
जालिम ज़माने को
कहो या दिल को अपने
जिंदगी का पैगाम
तो नया होता है .......
ख़ामोशी.........................
25-03-12(in train)