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Tuesday, 27 March 2012

खामोश रहकर भी ,जुबां चलती है




खामोश रहकर भी ,जुबां चलती है
आपसे दूर रहकर भी ,मेरी इन्तहा होती है
कौन जाने जिंदगी का दस्तूर कहा ले जाये
गम के शाम में भी खुशी की सुबह मचलती है
खामोश................



                           आपके होने का एहसास ही काफी हो जाता है 
                           गम में खुद को समाने से
                           दर्द का एहसास खुद व् खुद काफूर हो जाता है
                           आपके ख्यालों के उजालों में नहाने से
                           खामोश .................



चाहे लाख कोशिश कर लो
फिर भी बारिकिओं को को ही पकड़ पाओगे
दुबकी जो लगाई इसमें तो
खुद- का नया अवतार ही देख पाओगे
ख़ामोशी.........................


                             हर पल इसका इल्म अलग होता है
                             गम और खुशी का जुना होता है
                             जालिम ज़माने को कहो या दिल को अपने
                             जिंदगी का पैगाम तो नया होता है .......
                             ख़ामोशी.........................
  

                                      25-03-12(in train)

Friday, 16 March 2012

भुखमरी व लाचारी की ये जो आंच है


भुखमरी व लाचारी की ये जो आंच है
गरीब के पेट पे तमाच है
भ्रष्ट्राचार की ये सांच है
सरकार की ये जो नाच है
भुखमरी.........................


अज्ञानता व अशिक्षा का जो सांप है
डस रहा ये समाज है
लुट खसोट के जनता से
Swiss में बना रहा जो ताज है
भुखमरी ........................

हम जिन्हें पहनाते ताज है
वो ही गिराता हम सब पर गाज है
जनता से सरोकार नहीं
जितना हो लुट लो भाई ,बाप का ये राज़ है
भुखमरी .........................


Election में इनका बड़ा काज है
वोट मांगने में न इनको लाज है
वादों की लड़ी लगा के
भूल जाते कहा का ये साज़ है
भुखमरी ................................

संसद में न कोई करते काम
आम लोगों को भड़काना इनका काम
अंधकार में दौर लगा
कहते है हम तो आवाम के अंदाज़ है
भुखमरी......................................
                                  16th mar ,1:54am

Thursday, 15 March 2012

तुम्हे, क्या फर्क पड़ता है


तुम्हे ,क्या फर्क पड़ता है
कोई खाए या भूखे सो जाये
कोई पिए या प्यासे रह जाये
कोई धरा के आगोश में खो जाये
तुम्हे, क्या .................................

                               
गरीबी हो ,भर्ष्टाचार हो,अंधकार में समाज हो  
सोते को सुलाते रहो
भर्ष्टाचार को आंच लगाते रहो
गरीबो को गरीबी से,सोफे वालों का जेब गरमाते रहो
तुम्हे क्या......................................

देश में बेरोजगारी हो  ,लाचारी हो
तुम अराजकता ,अशांति फैलाते रहो
खुद उसमें चर्चा कर
अपने कर्तब्य से मुख मोड़ते रहो
तुम्हे क्या फर्क ..........................

कॉलेज ,स्कूल खोलते रहो
Quality के नाम पे बेरोजगारी बढ़ाते रहो
जातिवाद पर जनता को सुलगते रहो
वोट बैलेंस के लिए दंगा करवाते रहो.
तुम्हे क्या.................................


पोलिटिक्स को गंदा बनाते रहो
अपने को सवार कर सबको समझाते रहो
भारत को incredible बता
खुद तो लूटो और लुट्वाते रहो
तुम्हे क्या.......................................


गरीब के दर्द को ताख पे रखके सुलगाते  रहो
अहिंषा,अत्याचार में खामोश ,शांत हो कर खुद को सभ्य बनाते रहो
दूसरों के देख अपने को बचाते रहो
अत्याचार के खिलाफ कुछ मत करो
बस मोर्चे के पीछे से आवाज लगते रहो
तुम्हे क्या ................. 


                              13th march 2012
                                                                    To be continue……………….

Tuesday, 13 March 2012


खालिस  खामोश है
अब,तू मेरे पास है
फिर भी एक बेचैनी है
लगता नही इतना, आसान तेरा साथ है
खालिस ...............................................

ख़ामोशी हमेशा अच्छी नहीं होती
दिल में हो तो दर्द ,रिश्ते में नर्क के पास है
फिर भी आज सब अच्छा लगता है
ख़ामोशी भी कभी-कभी जिंदगी का पास है
खालिस ............................................

जब गुनगुनाता हूँ ,यादे आँखों में सिमट जाती है
जब तुम सीने में छुप जाती थी
झनझनाहट से रूबरू होकर
आंखे नाम हो जाती है
खालिस खामोश......................................

ऐसा नहीं है की,
तुम्हारे साथ सारे पल अच्छे थे या है
मगर मानों वो दिन मेरे नहीं की
किसी और के पास है
खालिस.......................................                                                                
हर पल ऐसा गुजरता है
मानों तुम्हारे साथ की खुशबु के पास है
अपनी चिंता धुंधली हो गई है
जब से तेरे साथ है
खालिस ...........................................

तना-सा तना हूँ मैं
तुझसे-ही मैं बना हूँ मैं 
जिंदगी सिमट जाये ,चाहे तो यहीं
तेरी ही जुस्तजू में हूँ मैं यहाँ
खालिस ...........................................

गम का शहर नहीं है
तुझे खोने का डर नहीं है
अपनी याद में तुम हो
खोवाहिश में तुम हो
ख़ामोशी में तुम हो
गम या प्यास में तुम हो
कालिस में भी तुम हो .......
खालिस ...................................................
                                     28TH SEP-11
                                     7:50PM ,Varanasi




असल मेरे ख्याल से उसूल
का बिगड़ा रूप है
असल में आप वो नहीं जो
आपके के भीतर का स्वरूप है
                           
ज़माने को न देखो
की वह कैसा है
इस कलयुग में
बाप बेटे जैसा है

यारों
लोगों ने तो गाँधी तक को नहीं बख्शा
देखने में गाँधी नज़र आयेंगे
भीतर झांक कर देखोगे तो
उनमें समाये नाथू-राम  नज़र आयेंगे

इस ज़माने में
वो हर चीज़ असली नहीं है
मंजिल आज है तो कल नहीं है
वो इंसान नहीं है,
जिसके दिलमें थोड़ा दर्द नहीं है 

ये कमबख्त मोहब्बत



न ढलती शाम
न होती सुबह
न मिलती तुम्हारी नज़ाकत
न होता कम्बखत ये मोहब्बत

तुम्हारे नजाकत भरे इशारे
ढाते है मुझपे  इख्तियारे
मैं मासूम-सा जिंदगी जी रहा था
तेरे नयनों के तीर कर दिए बेसाहरे

जुवान खुलती नहीं है देखकर
खुशबु गमक उठती है पाकर तेरे इशारे
नजाकत से भरी तेरी जवानी
उड़ा देते है मेरे होश सारे


बेपीर जिस्म धड़कता है
तेरे सहारे को तरसता है
मिलता है जब तेरा इशारा
जिंदगी मेरा गमकता है

नादानी अपनी छोड़ जायेगी


नादानी अपनी छोड़ जायेगी
बच्पन्न की झूलों को तोड़ जायेगी
जब हम अपनें में होंगे जवां
याद तेरी हमको बहुत आएगी

अपने में हमको होगी
याद तेरी जब हमको आएगी
बिछुड़ने के दिन जब याद आएगी
आँखों मेरी नम कर जायेगी

तेरे सपनों सलोनो में झांकेंगे हम
रातों को तुमको पाएंगे हम
अपनी बदकिस्मती पर रोते हुए
अक्सर तुमको मिल जायेंगे

मैं तो नाशाद हमदम रहूँगा
मिलके निराशा से लडूंगा
तेरे वगैर मैं तो जी सकूंगा
तुझको न देखकर शायद मर जाऊंगा
                                           


ये जो है ! दोस्ती


ये
जो बेपनाह मोहबत से विभोर
एक-दूसरे की जिंदगी में चूर
ये
गम
जो कभी ना हो कम
फिर भी हमेशा साथ रहे खुशी
मज़बूरी
मगर इख्तियार
इंतज़ार
जो कर दे बेक़रार
मनाही
मगर प्यार
ये
जो कहता है
बुरी नज़र
छोड़ ना यार
बदनाम समाज
बेपरवाह आज
आज का मेहनत
कल का भविष्य
आज का लगन
जिंदगी का अमन
ऐसा दीक्षित
हमारी यारी और
ये
जो है !
दोस्ती................................................. 








तेरा चेहरा झलकता है


हमेशा
यूँ ही होता है
दिल के काल कोठरी में
कोई राहगीर
कोई बेपीर
अचानक बेइरादा
जलते दीपक-सा चमकता है
तेरा चेहरा झलकता है

इसी दीपक के रौशनी में
कभी अंधकार में
रौशनी के फरिश्तों-सा
बिना लफ्ज पूरी कहानी के साथ
तेरा चेहरा झलकता है

सुलगते दिल की बस्ती में
जलते गम की आंधी में
विनोद के विनोद में
मेस में क्लास में
ख्वाब्ब के प्लेट में
कभी गम के रास में
तेरा चेहरा झलकता है


 
जब दिल के काल कोठरी में
दीपक जलता प्रतीत होता है
खुला कागज-कलम
नया मिसरा बन निकलता है
यूँ ही मेरा दिन गुजरता है
हमेशा
यूँ ही होता है .................
तेरा चेहरा झलकता है 

क्या यही तेरा इंसाफ है


                                        23.   क्या यही तेरा इंसाफ है
ऐ रोशनी के फरिस्ते
अंधकार क्यों है मेरी जिंदगी में
क्या यही तेरा इन्साफ है
जो हर कदम पे बताता इर्ष्या,द्वेष् जलन
और खुद को दिखता साफ़ है

ऐ रोशनी के ...................................
जहाँ जाऊँ मिलता तिरष्कार है
निच-द्वेष् भाव से देखता यह संसार है
किसी को मिलता मुकम्मल आसमां है
किसीको मिलता नहीं जीवन की आस है
क्या यही तेरा इंसाफ है ................

जो बोल ना पाते थे एक लफ्ज
उनकी आज यहाँ तादाद है ..
जिनके पूर्वजों ने हमें खंगाला
आज उनकी यहाँ ओउकाद है
क्या यही तेरा इंसाफ है ..........................