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Wednesday, 18 January 2017

दूर से दूरियां बनती है
पास भी कभी कभी मज़बूरियां बनती है
जियो हर पल अपनी जिंदगी
दूसरों की जीने से ही कमजोरियां बनती है

ये कैसा है संसार

ये कैसा है संसार
इंसान करता नहीं इंसानियत से प्यार
सच और नेक का छोड़ो
झूठ और फ़रेब का करता हर कोई व्यापार
ये कैसा.........

हर कोई लगा है यहाँ
कैसे काटके बनु मैं मालदार
सब जानते है कुछ न जायेगा साथ
फिर भी डूबी पड़ी है सबके विचार
ये कैसा .........

सम्भल जाओ ये संसार
यहाँ आये हो बढ़ाने प्यार और विचार
मत करो किसी पे अत्याचार
हर तरफ बांटों ख़ुशी और व्यवहार
इसी में है हर धर्म का विस्तार
           -Binodanderson
            M.nagar(22:42)
            18/01/17

Saturday, 14 January 2017

तेरी याद
न रात सोने देती है
न सुबह जगने देती है
इस मुफ़लिसी में
कमबख़्त बिस्तर भी बेचैनी देती है
तेरी याद

ये आग सी बेचैनी है
जलने बुझने की
ख़ाक भी न होता है
समंदर से प्यास की
ये आग
पलकें छोड़ आता हूँ तेरी उम्मीदों में
फिर भी जिद्द करता है ढूंढने की

इस प्रकाश (लोहड़ी) में
अंधकार-सा हूँ
जलते दीये में
ठंढी- ताप सा हूँ
ख़ामोशी में लिपटा हुआ
जबाब सा हूँ
ख़ुशी बस चार दिन की
बिखरा हुआ आफ़ताब सा हूँ
जिधर देखो मेरी ज़िंदगी में
गूंजता हूँ हतास सा हूँ
आँसु तो नहीं बचे अब आँखों में
बस कलम का किताब सा हूँ
फ़ितूर भी जो साथ था वो न रहा
ऐसा मैयत का नायाब सा हूँ
क्या देखोगे मुझें ,कोई चीज़ न बची है
बस ज़मीन पे बिखरा कबाड़ सा हूँ
दर्द बस अब मिसरा में बाकि है
सूखते हुए रगों में कसिने नहीं मिलते
बर्फ़ की रेत में चुलुभर पानी के हिसाब सा हूँ
                  -Binodanderson
                   M.nagar Delhi(1:26AM)
                    13/01/17

Friday, 13 January 2017

अंधकार सा हूँ

इस प्रकाश (लोहड़ी) में
अंधकार-सा हूँ
जलते दीये में
ठंढी- ताप सा हूँ
ख़ामोशी में लिपटा हुआ
जबाब सा हूँ
ख़ुशी बस चार दिन की
बिखरा हुआ आफ़ताब सा हूँ
जिधर देखो मेरी ज़िंदगी में
गूंजता हूँ हतास सा हूँ
आँसु तो नहीं बचे अब आँखों में
बस कलम का किताब सा हूँ
फ़ितूर भी जो साथ था वो न रहा
ऐसा मैयत का नायाब सा हूँ
क्या देखोगे मुझें ,कोई चीज़ न बची है
बस ज़मीन पे बिखरा कबाड़ सा हूँ
दर्द बस अब मिसरा में बाकि है
सूखते हुए रगों में कसिने नहीं मिलते
बर्फ़ की रेत में चुलुभर पानी के हिसाब सा हूँ
                  -Binodanderson
                   M.nagar Delhi(1:26AM)
                    13/01/17

क्या सिर्फ़

क्या सिर्फ़ हम ही लड़ते है
या ऐसा होता है प्यार में
ज़ुबां यूँ ही फिसल जाता है
या ऐसा होता है तक़रार में
क्या सिर्फ़.......

बड़ी मुद्दतों से है हम मिले
ये क्यूँ भूल जाते है दरार में
अभी तो बहुत कुछ करना बाक़ी है
अभी ही मान लिया हार इक़रार में
क्या सिर्फ़........

माना मैं ही ग़लत होता हूँ
तो तुम क्यों पड़ जाती हो बेकार में
ऐसे तो न हम जी पाएंगे न तुम
दोनों ही लड़ते रहेंगे प्यार में
क्या सिर्फ़............
            -Binodanderson
             M.nagar (13/01/17)
             21:54

Monday, 9 January 2017

चलो अब नई शुरुआत करते है

चलो अब
जो बीत गई सो बात गई
अब नये साल से
नई शुरुआत करते है
हम अपनी ज़िंदगी को
नई पँख नये आयाम देते है
चलो अब.....

जो हो गई थी बैर
उनको भी अब समाप्त करते है
नये जोश और उल्लास से
हम अब नई सुरुआत करते है
चलो अब .......

हर लबों पे ख़ुशी लाकर
ख़ुद की भी ख़ुशी महसूस करते है
अपनी ज़िंदगी तो हर कोई जीता है यहाँ
एक बार उन बेसहारा,मज़बूर के लिए जीते है
चलो अब ........

ऊंच,नीच,जात पात छोड़ के
मानवता का हाथ पकड़ते है
बुझ गए है जिनके दीये
उनके घरों में भी रौशनी की बरसात करते है
चलो अब ..........

ये सब युवा ही कर सकता है
आओ सब मिलके एक दुज़े का हाथ पकड़ते है
गुज़र गया हो दिन तो क्या
इस नये साल से शुरुआत करते है
चलो अब .........
             -Binodanderson
              M.nagar (29/12/16)

चलो अब
जो बीत गई सो बात गई
अब नये साल से
नई शुरुआत करते है
हम अपनी ज़िंदगी को
नई पँख नये आयाम देते है
चलो अब.....

जो हो गई थी बैर
उनको भी समाप्त करते है
नये जोश और उल्लास से
हम अब नई सुरुआत करते है