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Saturday, 14 January 2017

इस प्रकाश (लोहड़ी) में
अंधकार-सा हूँ
जलते दीये में
ठंढी- ताप सा हूँ
ख़ामोशी में लिपटा हुआ
जबाब सा हूँ
ख़ुशी बस चार दिन की
बिखरा हुआ आफ़ताब सा हूँ
जिधर देखो मेरी ज़िंदगी में
गूंजता हूँ हतास सा हूँ
आँसु तो नहीं बचे अब आँखों में
बस कलम का किताब सा हूँ
फ़ितूर भी जो साथ था वो न रहा
ऐसा मैयत का नायाब सा हूँ
क्या देखोगे मुझें ,कोई चीज़ न बची है
बस ज़मीन पे बिखरा कबाड़ सा हूँ
दर्द बस अब मिसरा में बाकि है
सूखते हुए रगों में कसिने नहीं मिलते
बर्फ़ की रेत में चुलुभर पानी के हिसाब सा हूँ
                  -Binodanderson
                   M.nagar Delhi(1:26AM)
                    13/01/17

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