ऐसा अब लगता है
भीड़ भी पुराना हो गया
जो कल तक सबसे क़रीब थे
अब वो अनजाना हो गया
बगैर उनके जो ढ़लती न थी शाम अपनी
वो ऐसे बेगाना हो गया
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Saturday, 23 September 2017
Thursday, 21 September 2017
Wednesday, 20 September 2017
इक तू ही तो है
है अज़नबी शहर
अज़नबी हवा मौसम भी ।
ज़िक्र तुम्हारी करके
कतरा कतरा करके ज़ख्मों पे नमक छिड़कते भी।
क्या कहूँ किसे कहूँ
इक तू ही तो था मेरा दर्द मेरा सुकूँ भी
खंडहर पथरीली राहबेरों में संवारना
इक तू ही तो था दोस्त भी ज़ुनू भी
तेरी गुमशुदगी मुझे रुलाती है
छुपा नही पता दर्द और तेरी रुसवाई भी
Tuesday, 19 September 2017
Monday, 18 September 2017
Sunday, 17 September 2017
आज जो क़ुदरती शाम थी
तुम पास न थे बस तेरी याद थी
मैं जानता हूँ मेरी कमी तुझे परेशां करती है
तुझमे तू न थी , मुझ में भी मेरी कमी थी
हर पल तेरे साथ होने को टटोलता हूँ
मग़र ख़ुद को सिरहाने की नमी पड़ी थी
आज जो
तू दूर रह के जो यूँ मुझसे ही मुझे पाने को लड़ते हो
मैं मानता हूँ तेरा भी मुक्कमल मैं हूँ
मेरी हर शाम हर शहर तुझसे है
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