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Wednesday, 17 October 2012

तू था वंहा मेरे लिए



जब भी मैं अकेला हुआ 

 तू था  वंहा मेरे लिए  
वो अजनबी शहर  
नाराज़गी हर पहर 
ख़ामोशी के दरम्या 
फिर भी तू  था  वंहा मेरे लिए....


हर  गम  हर  शहर 

अजनबी  व अपनों का कहर 
वो खली हाथ ,वो तंगी की रात 
Street food की बात 
मोमोस की प्यास 
तीखा  -सा एहसास
किसीके न होने का कयास 
रात के  सनाटों भटकता हुआ मैं अकेला 
फिर भी तू था  वंहा मेरे लिए .........


वो शाम 

जब हो रही थी निर्झर जल की बरसात 
वो ख़ुशी के दो - चार पल 
वो India gate ,Haldiram का कल 
Office के बाद Burger के साथ 
सड़कों की याद 
गम की फुहार 
College campus की बात 
दिन हो या रात 
जब भी मुझे एहसास हुआ 
तू था  वंहा मेरे लिए .....

16th -oct-12

6pm

Tuesday, 16 October 2012

ज़िंदगी में.........


ज़िंदगी में उलझनों से भरा हूँ

दोहरी मोड़ पे खड़ा खड़ा हूँ
गम की चादरों को लपेटे
ख़ुशी के इंतज़ार में पड़ा हूँ
ज़िंदगी में..............


उथल-पुथल ,नोंक-झोंक  से सना हूँ

आँधियों से,आँधियों के  बीच लड़ा हूँ
पर ,वक्त ने बेवक्त ऐसा कर डाला
इस मझधार में ,अकेला खड़ा हूँ
ज़िंदगी में..............


रह में राहगीर बना हूँ

दर्द में भी तना हूँ
ज़िंदगी के कुंठित खेल में
मनो ,मैं मर ही गया हूँ
ज़िंदगी में..............


हर बार मेरी इन्तहा क्यूँ होती है

न चाह के भी इसमें हर-बार पड़ा हूँ
क्या हम जैसों का ज़िदगी बनाने का हक़ नहीं है
तो इस ज़िंदगी के धार में ,मैं ही क्यूँ खड़ा हूँ
ज़िंदगी में..............

16th-oct-12


Sunday, 14 October 2012

मेरी तन्हाई....



मेरी तन्हाई
रुख नमी का
सख्त कमी का
अजनबी शहर का
अंजना कहर का
मेरी तन्हाई...

मौसम तापेड़ों के
मेरे रह्बेरों में
फर्श दर्द का
द्रश्य दुरी का
तुमसे बिछुड़ने का
समां में सहमे
हवा में नमी का
साँस में तुम्ही का
class में lecture ka
जिस्म में structure का
pain में fracture का
life में future का
एहसास जंवा कर जाता है
मेरी तन्हाई.............

मेरी तन्हाई में
तुम इसकदर ,ज़िस्म के रूह में रवां हो
मनो मैं खुद में नहीं ,
तू मुझमें  फ़ना  हो....

                                               13th-oct.12

Saturday, 6 October 2012

आज फिर






आज फिर चादरों में
सिमटी यादों को लपेट रहा हूँ
खामोश पलकों में
तुम्हें  महसूस कर रहा हूँ
आज फिर ................

दिल के तख्तों-ताज़ पर
तुम्हें हमेशा मेहरबान करता हूँ
बिखरे किताबों के सिरहाने
हमेशा तुम्हें पाने की कोशिश करता हूँ
आज फिर ................

बड़ी उलझन में हूँ
फिर भी आपसे हमदी करता हूँ
नाकाम नासूर दर्द को
हमेशा दूर करने की कोशिश करता हूँ
आज फिर ................

उल्फ़त ये आ पड़ी है
कसमकस में  सफ़र काट  रहा हूँ
जाने कब तुम्हारी यादें सच्चाई बन सामने आ जाएगी
इस इंतजार में उम्र काट रहा हूँ
आज फिर ................

Friday, 5 October 2012

हे ईश्वर ................


हे ईश्वर
मेरी प्रार्थना स्वीकार करना
सदा मुझे सम बनाना
दुःख मिले तो न घबराये
ऐसा ही मुझे  इंसान नानना
हे ईश्वर ............................

सांसारिक जीवन से मुक्ति दिलाना
याद करूँ और तू आ जाना
जीवन तुम्हारे चरणों अर्पित कर जाऊ
कुछ ऐसा मुझसे करवाना
हे ईश्वर ..............................

आप पर ही आस बनी है
आप से इ मेरी साँस जुड़ी है
कोई मुझे न दे पाए ताना
हे ईश्वर मुझे कुछ ऐसा बनाना
हे ईश्वर .......................

Thursday, 4 October 2012

तुम बिन



कल फिर तुम्हें खामोशिओं ने
तलाशा
हर नज़र ने फिर तुम्हे
तराशा
यादों के दरीचे इतने लम्बे थे
फिर भी तुम्हारी तस्वीर को
यूँ  उकेरा
साँस थमी रह गई
तुझे देखतें ही आँखों में नमी रह गई
लहू बनके बस्ती हो मेरे जिस्म में ऐसे
खामोश दर्द में भी तेरी खुशबु रह गई

वैसे तो

तुम्हारे बगैर बीते लम्हों की गुज़ारिश इतनी कम है
फिर भी ,एहसास  सालों  का  होता है
मुदतों में हमेशा तुम्हे मांगता हूँ
इंतजार में हमेशा ,नज़रों को तख़्त पे रखता हूँ
ये कैसा प्यार है
तुम्हारे जाने के एहसास से ,
ज़िस्ममें एक कमी समा जाती है
लफ्ज़ बेज़ुबा ,नब्ज़ में तेरी याद रवां हो जाती है
दिल-दिमाग में तू छा जाती है
हर एहसास को मैं
पन्नों पे उकेर नहीं पता हूँ
तेरे absent में
खुद को क्षुब्द पता हूँ ...............


तेरी यादों ....................


तेरी यादों की गर्मी से
गर्म मेरा समां हो जाता है
जहाँ तेरी कमी हो
वहां भी तू रवां हो जाता है
तेरी यादों ....................

कसमकस मेरे ख्वाहिश में तेरी
फिर भी एक एहसास बाकी होता है
थप्पेरे तेरे ,मेरे दरिचें में
जश्न -सा माहौल बना रहा होता है
तेरी यादों ....................

जब तेरा साथ होता है
मनो समय थम-सा जाता है
जिंदगी में हमेशा ,चर सयों के
अचर गर्त में दुबकी लगा रहा होता है
तेरी यादों ....................

इन तरानों के संग ,जिंदगी बढ़ रही है
कभी पास तो कभी दूर हो जाती है
इतनी करवटें बदलती है जिंदगी
फिर भी तुम्हरी बाँहों में शांत हो जाती है
तेरी यादों ....................


एक मर्ज़ है


एक मर्ज़ है
दर्द का
एहसास का
प्यास का
आपके खुबसूरत जज्बात का
एक मर्ज़ है
बिताये खुबसूरत पल का
उन यादों का
जो मेरे जिस्म में
गुदगुदी करा जाती है
वो फुटपाथ का
उन गलियारों का
उन प्यार के फव्वारों  का
एक मर्ज़ है
दोनों के निर्झर जल का
ह्रदयस्पर्शी नोक झोंक का
ख़ामोशी के जज्बात का
खाने में डांट का
सोने में पुचकारने का
रोने में सहलाने का
एक मर्ज़ है
अँधेरे में रौशनी का
पानी में प्यास का
जिस्म में साँस का
अखंडता में विश्वास का
दर्द में  एहसास का
गम में रास का
जीवन में कयास का
एक मर्ज़ है
                                   (To be cont.......)