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Wednesday, 17 October 2012

तू था वंहा मेरे लिए



जब भी मैं अकेला हुआ 

 तू था  वंहा मेरे लिए  
वो अजनबी शहर  
नाराज़गी हर पहर 
ख़ामोशी के दरम्या 
फिर भी तू  था  वंहा मेरे लिए....


हर  गम  हर  शहर 

अजनबी  व अपनों का कहर 
वो खली हाथ ,वो तंगी की रात 
Street food की बात 
मोमोस की प्यास 
तीखा  -सा एहसास
किसीके न होने का कयास 
रात के  सनाटों भटकता हुआ मैं अकेला 
फिर भी तू था  वंहा मेरे लिए .........


वो शाम 

जब हो रही थी निर्झर जल की बरसात 
वो ख़ुशी के दो - चार पल 
वो India gate ,Haldiram का कल 
Office के बाद Burger के साथ 
सड़कों की याद 
गम की फुहार 
College campus की बात 
दिन हो या रात 
जब भी मुझे एहसास हुआ 
तू था  वंहा मेरे लिए .....

16th -oct-12

6pm

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