कल फिर तुम्हें खामोशिओं ने
तलाशा
हर नज़र ने फिर तुम्हे
तराशा
यादों के दरीचे इतने लम्बे थे
फिर भी तुम्हारी तस्वीर को
यूँ उकेरा
साँस थमी रह गई
तुझे देखतें ही आँखों में नमी रह गई
लहू बनके बस्ती हो मेरे जिस्म में ऐसे
खामोश दर्द में भी तेरी खुशबु रह गई
वैसे तो
तुम्हारे बगैर बीते लम्हों की गुज़ारिश इतनी कम है
फिर भी ,एहसास सालों का होता है
मुदतों में हमेशा तुम्हे मांगता हूँ
इंतजार में हमेशा ,नज़रों को तख़्त पे रखता हूँ
ये कैसा प्यार है
तुम्हारे जाने के एहसास से ,
ज़िस्ममें एक कमी समा जाती है
लफ्ज़ बेज़ुबा ,नब्ज़ में तेरी याद रवां हो जाती है
दिल-दिमाग में तू छा जाती है
हर एहसास को मैं
पन्नों पे उकेर नहीं पता हूँ
तेरे absent में
खुद को क्षुब्द पता हूँ ...............
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