मुझे मालूम नहीं
ये मैं क्या कर रहा हूँ
ज़िन्दगी बनाने में ही
ज़िंदगी कम कर रहा हूँ
हर किसी से सुना है हमनें
कुछ बन जा फिर मौज़ करना
वक़्त का तकाज़ा नापने चला हूँ
घटते हुए दिन में
सोचता हूँ मैं जी रहा हूँ
या यूँ ही वक़्त काट रहा हूँ
जैसे कोई सज़ा दी गई हो उनकी महफ़िल में
मुझे मालूम नहीं........
Thursday, 22 December 2016
कहे अग़र
कहे अगर तो,
कह दो की दिन नहीं
अब रात है
एक ही दीवार के आश्रय में
होती ख़ामोशी में अब बात है
वो ज़माना गुज़र गया
जब मुस्कुराने को समझते थे, साथ है
अब तो नज़रें भी मिलाना ज़ुर्म है
गलती से भी गलती न कीजियेगा
वर्ना कब सुनने को मिल जाय
तुम्हारी क्या औक़ात है
ये ग़लत भी नहीं है मग़र
सही का भी कहाँ साथ है
जितनी टेंशन chemistry,physics,और डेबिट क्रेडिट नही देती
उतना तो फ्रेंड zone का हाथ है
कहे अगर
तो कह दो .....😉😉
Wednesday, 7 December 2016
ख़ालिस है या ख़ता है
ख़ालिस है या ख़ता है
गुमनामी में हूँ या नशा है
तू कुछ कहता क्यूँ नहीं
इस मर्ज़ी की वज़ह क्या है
ख़ामोश दर्द की इंतहा क्या है
टुकड़ो में ज़िन्दगी की वज़ह क्या है
कहते है लोग ,वक़्त पे सब कुछ मिल जाता है
तो रहबेरों में चुन्ने की वज़ह क्या है
या तो तू है जो ये सब चलाता है
सृस्टि या हमारे जैसे को घुमाता है
साफ़ साफ़ क्यों नहीं कहता कसुर क्या है
आख़िर क्यूँ मुझें इतना भटकाता है
कहते है तेरे घर में देर है अँधेर नहीं
मगर मैं पूछता हूँ वो वक़्त कहाँ है अब तक
जिसके इंतज़ार में रंजनी हो चला है ये नयन
अगर देना ही तो इतना क्यूँ सताता है
ख़ालिस है या ख़ता है ........
-Binodanderson
7/12/16(23:30)
M nagar