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Thursday, 22 December 2016

कहे अग़र

कहे अगर तो,
कह दो की दिन नहीं
अब रात है
एक ही दीवार के आश्रय में
होती ख़ामोशी में अब बात है
वो ज़माना गुज़र गया
जब मुस्कुराने को समझते थे, साथ है
अब तो नज़रें भी मिलाना ज़ुर्म है
गलती से भी गलती न कीजियेगा
वर्ना कब सुनने को मिल जाय
तुम्हारी क्या औक़ात है
ये ग़लत भी नहीं है मग़र
सही का भी कहाँ साथ है
जितनी टेंशन chemistry,physics,और डेबिट क्रेडिट नही देती
उतना तो फ्रेंड zone का हाथ है
कहे अगर
तो कह दो .....😉😉

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