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Saturday, 30 July 2016

दर्द को कब तक बेचता रहेगा

जिंदगी के दर्द को
कब तक बेचता रहेगा
मरहम  की आड़ में
सेंकता रहेगा
जिंदगी के दर्द....
उठ खड़ा हो ,सामना कर
दर्द और मर्ज़ की परवाह छोड़
कब तक किस्मत को कोसता रहेगा
वक़्त के साथ चल न आराम कर
मंजिल के पहले न विश्राम कर
मंझधार में कब तक टहलता रहेगा
ज़िन्दगी के दर्द......
एक साँस में पूरी न जी पायेगा
आधे पे रुका तो भी पचतायेगा
यूँ दुरी और गहराई को देख के न डर
अगर डरा तो क्या पूरी ज़िन्दगी जी पायेगा
ज़िन्दगी के दर्द को
कब तक बेचता रहेगा
              -Binodanderson
               21:18 (5th August 16)

Sunday, 24 July 2016

तस्वीर तल्ख़ जब पेपर में आई
कैसे बताऊँ क्या दर्द दिखाई
कल तक जो पूछता न था
कल तक जो जानता न था
आज बना है हमारी प्रजाई
तस्वीर

दूर से लोग अब पूछत है
कहो सुनाओ अब कैसी हो जाई
हम तो जानत है ये सब मज़िरा
कल बीत जाय फिर कौनो न पहचानाइ
तस्वीर

          24/7/16
           1:15 AM

Friday, 22 July 2016

तुम वो नहीं

तुम वो नहीं
जिसको जानते है
आज भी लोग
खुद को न पहचानते है
जमाना चाँद तक जा पहुँचा है
मगर आज भी इंसान इंसान को धुत्कारते है
तुम वो नहीं

ज़िंदगी गुज़र जाती है ख़ुद को बनाने में
आज भी ख़ुद को तामिल
औरों को कबाड़ मनाते है
देखो ज़रा इनका रुतबा
अपने दर्द पे मरहम, दूसरों पे नमक डालते है
तुम वो नहीं

बिना ज़ुबां की समझ नहीं तुझे
लेकिन अपने इंसानियत को तो जानता है
नहीं डरता हो अगर ख़ुदा से
मगर अपनी जन्म को तो मानता है
तुम वो नहीं
               -Binodanderson
                 21:37PM,20/07/2016

दर्द बदस्तुर जारी है

दर्द बदस्तुर जारी है
सोच आज भी गंदी हमारी है
हर कोई ठोक के कहता है मैं हिन्दू हूँ ,मैं मुस्लिम हूँ
क्या यही धर्म की कैफ़ियत हमारी है
दर्द बदस्तुर जारी है

इंसानियत पे मौन ,जनता सारी है
पीस रहे वो लोग जो होता छोटा व्यपारी है
धर्म जात से न मतलब उनको
सीधे साधे कर रहे जो गुज़ारी है
दर्द बदस्तुर जारी है

पेट में आनाज भी उनका
जिस्म में लिबास भी उनका,
फ़रमाते आराम जिन कुर्सियों पर
वो भी सारो समाज उनका
फिर भी आज उनकी इज़्ज़त पे भरी है
दर्द बदस्तुर जारी है

                -Binodanderson
                 22/07/16,17:37

Tuesday, 19 July 2016

न मुकम्ल जहाँ हुआ

न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए
ये कैसी ज़िन्दगी ने राह बुनी
जिधर क़दम रखे बस काँटे नसीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए

न मेरा  क़सूर है
न ज़ुल्म आपका
तो ख़ता मैं किसकी कहूँ
जो बदनसीबी नसीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए

ये तो इनायत करम है उनका
जो दो वक़्त साथ सबब हुए
आपका को तो बस शुक्रिया
ख़ुशी में भी मुज़सिर न करीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए

न इब्बादत का असर हुआ
न ज़हर शहर हुए
इज़ारत भी कम न था
जो रहबरों में  घर हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए

न उम्मीद कम हुआ
न ही आँखे नम हुए
देखता हूँ मैं भी सांस तक
दोज़ख करीब है ,या मंज़िल नसीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए

          -Binodanderson
           19th July2016
            मुखर्जी नगर

Saturday, 9 July 2016

इतनी दूर आ गया
फिर भी अब सोचता हूँ
क्या जी पाउँगा तेरे संग
या तुझ बिन
झकझोर  दिया जो बुनता हूँ
इतनी दूर

हर पल हर लम्हा तूने साथ दिया

9/7/16, 22:51 mukharji nagar

वर्षो गुज़र गए
न हम सुधरे न  तुम सुधरे
आज भी मैं सोचता हूँ
तुम कहाँ ठहरे हम कहाँ ठहरे
वर्षो ........

क्या कहूँ
गुस्ताख़ी किसकी है
कभी किसी बात को तुम पकड़े
कभी हम पकड़े
अपने प्यार का पेड़ है मजबूत
तभी तो आज तक है जकड़े
मगर टहनी न जाने बात बात ये क्यों अकड़े
वर्षो ......

            9/7/16=21:42 Mukharji nagar

वर्षो गुज़र गए
न हम सुधरे न  तुम सुधरे
आज भी मैं सोचता हूँ
तुम कहाँ ठहरे हम कहाँ ठहरे
वर्षो ........

क्या कहूँ
गुस्ताख़ी किसकी है
कभी किसी बात को तुम पकड़े
कभी हम पकड़े
अपने प्यार का पेड़ है मजबूत
तभी तो आज तक है जकड़े
मगर टहनी न जाने बात बात ये क्यों अकड़े
वर्षो ......

            9/7/16=21:42 Mukharji nagar

हर कोई है अपनी माँ से दूर

हर कोई है अपनी माँ से दूर
पैसे कमाने में चूर
जो किया है सब कुछ
उनके तस्बुर में उनसे ही दूर
हर कोई ........

कैसा ये ज़माना हो गया
मज़बूरी  के हाथों है मज़बूर
बच्पन के निवालों का कर्ज़
दे दिया बस उनको उम्मीदों का सुर
हर कोई .........

सिमट गई है ज़िन्दगी त्यौहार में
नसीब से ही होता है उनका दीदार
वो भी कभी - कभी यु ही गुज़र जाता है
आज Technology में ही है दुनिया फ़ितूर
हर कोई .........

उनको लगता है आज भी
कुछ अच्छा करूँगा ज़रूर
पर कैसे बताऊ उनको
ज़िंदगी दो पल में ही हो गया है काफ़ूर
हर कोई ............

कुछ हो जाय
पर ख़ैरियत लेंगी ज़रुर
ख़ुद से ज़्यादा आज भी है समझती
पता नहीं ऐसा क्या है दिया
मिलके ईश्वर से पूछुंगा ज़रुर
हर कोई ............
         -Binodanderson
           Mukharjee nagar
            Delhi

Thursday, 7 July 2016

तेरे संग जो

तेरे संग जो होता हूँ
मनो पूरा पल जीता हूँ
चाहे ख़ामोश रहूं या कुछ कहूँ
मग़र पूरी कहानी गढ़ता हूँ
तेरे संग जो ........

ज़िन्दगी लम्हों में ही सही
पर पूरी फ़ितूर पीता हूँ
इतेफ़ाक़ नहीं रखता ,किसी गम से
जब भी ख़ुद को तेरे पास रखता हूँ
तेरे संग जो ......

मेहरूम हूँ तेरे हर आदतों से
ख़ुद को जो तुझमें महसूस करता हूँ
मत होना तू ज़ुदा कभी
मर जाऊंगा ,साँस जो तुझसे लेता हूँ
तेरे संग जो ..........
               -Binodanderson
                 Mukharjee nagar
                 7/7/16, 1AM

न बात हुई

न बात हुई
न मुलाक़ात हुई
ये अज़ीब- सा
इतेफ़ाक़ मेरे साथ हुई
वो दूर से निहार के चले गए
मैं भी ख़ामोश देखता रहा
ये हक़ीक़त मेरे साथ हुई
इल्म उनका था
या ग़लती हमारी ,केह नहीं सकता
जो उस रात सिने में बरसात हुई
दिल चोट से क्या उबारता
पलकों में बसे पल से जो बात हुई
कोशिश उसने भी की होगी
बिखरते लम्हों की जो अफरात हुई
कई बार तराशा उन दरीचों को
न कभी फिर उनसे
मुलाक़ात हुई

मैं बंधना नहीं चाहता

मैं बंधना नहीं चाहता
इस 9 से 5 में
ख्वाहिशों को रोक नहीं सकता
इस खुले आकाश में
ज़िंदगी बोझ-सी होगी
इस Duty और responsibility के क्लेश में
मैं बंधना नहीं चाहता .........

और भी तरीक़े होंगे जीने के
जी नहीं सकता सिर्फ़ अवकाश में
इक बार मिलती है ज़िंदगी
इसको छोड़ नहीं सकता यूँ उम्मीदों के आस में
मैं बंधना नहीं चाहता ......

मैं उड़ना चाहता हूँ
इस उन्मुक्त गगन के प्यास में
जिन्दा रखना चाहता हूँ ,ख्वाहिशें कुछ अपने कुछ दूसरों के
मरना नहीं चाहता सिर्फ भोग विलास  में
मैं बंधना नहीं चाहता
सिर्फ 9 से 5 में

             -Binodanderson
               5th-July, 16
              Mukharji nagar