न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए
ये कैसी ज़िन्दगी ने राह बुनी
जिधर क़दम रखे बस काँटे नसीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए
न मेरा क़सूर है
न ज़ुल्म आपका
तो ख़ता मैं किसकी कहूँ
जो बदनसीबी नसीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए
ये तो इनायत करम है उनका
जो दो वक़्त साथ सबब हुए
आपका को तो बस शुक्रिया
ख़ुशी में भी मुज़सिर न करीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए
न इब्बादत का असर हुआ
न ज़हर शहर हुए
इज़ारत भी कम न था
जो रहबरों में घर हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए
न उम्मीद कम हुआ
न ही आँखे नम हुए
देखता हूँ मैं भी सांस तक
दोज़ख करीब है ,या मंज़िल नसीब हुए
न मुकम्ल जहाँ हुआ
न रास्ते सरिक हुए
-Binodanderson
19th July2016
मुखर्जी नगर
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