न बात हुई
न मुलाक़ात हुई
ये अज़ीब- सा
इतेफ़ाक़ मेरे साथ हुई
वो दूर से निहार के चले गए
मैं भी ख़ामोश देखता रहा
ये हक़ीक़त मेरे साथ हुई
इल्म उनका था
या ग़लती हमारी ,केह नहीं सकता
जो उस रात सिने में बरसात हुई
दिल चोट से क्या उबारता
पलकों में बसे पल से जो बात हुई
कोशिश उसने भी की होगी
बिखरते लम्हों की जो अफरात हुई
कई बार तराशा उन दरीचों को
न कभी फिर उनसे
मुलाक़ात हुई
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