दर्द बदस्तुर जारी है
सोच आज भी गंदी हमारी है
हर कोई ठोक के कहता है मैं हिन्दू हूँ ,मैं मुस्लिम हूँ
क्या यही धर्म की कैफ़ियत हमारी है
दर्द बदस्तुर जारी है
इंसानियत पे मौन ,जनता सारी है
पीस रहे वो लोग जो होता छोटा व्यपारी है
धर्म जात से न मतलब उनको
सीधे साधे कर रहे जो गुज़ारी है
दर्द बदस्तुर जारी है
पेट में आनाज भी उनका
जिस्म में लिबास भी उनका,
फ़रमाते आराम जिन कुर्सियों पर
वो भी सारो समाज उनका
फिर भी आज उनकी इज़्ज़त पे भरी है
दर्द बदस्तुर जारी है
-Binodanderson
22/07/16,17:37
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