हर कोई है अपनी माँ से दूर
पैसे कमाने में चूर
जो किया है सब कुछ
उनके तस्बुर में उनसे ही दूर
हर कोई ........
कैसा ये ज़माना हो गया
मज़बूरी के हाथों है मज़बूर
बच्पन के निवालों का कर्ज़
दे दिया बस उनको उम्मीदों का सुर
हर कोई .........
सिमट गई है ज़िन्दगी त्यौहार में
नसीब से ही होता है उनका दीदार
वो भी कभी - कभी यु ही गुज़र जाता है
आज Technology में ही है दुनिया फ़ितूर
हर कोई .........
उनको लगता है आज भी
कुछ अच्छा करूँगा ज़रूर
पर कैसे बताऊ उनको
ज़िंदगी दो पल में ही हो गया है काफ़ूर
हर कोई ............
कुछ हो जाय
पर ख़ैरियत लेंगी ज़रुर
ख़ुद से ज़्यादा आज भी है समझती
पता नहीं ऐसा क्या है दिया
मिलके ईश्वर से पूछुंगा ज़रुर
हर कोई ............
-Binodanderson
Mukharjee nagar
Delhi
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