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Thursday, 28 April 2016

वो कहानी 
अब, मैं भी बन गया हूँ
अधूरी दास्ताँ में 
इस कदर सन गया हूँ
सुना बहुत था
जिंदगी में के बारे में
अब मैं भी उसी का 
हिस्सा बन गया है
पिघले वक़्त में 
ऐसे ठिठुर गया हूँ 
साँस तो अपनी ही जगह है 
बस मैं ही हिल गया हूँ
कहते है मरने के बाद
ज़िस्म बेपीर हो जाता है
ऐसा तो मैं जीते जी 
बन गया हूँ
गम न थी 
कभी मुख़ातिब
मनो अब तो 
गम में ही घुल गया हूँ
एक कांच सी थी चमक
तेरे आने से
अब
अंधकार सा बिखर गया हूँ
इनायत ख़ुदा से इतनी करता हूँ
तू मिल जाय,बग़ैर तेरे तो जीना
मुमकिन नहीं
इस कदर तुझमें
जो फ़ना हो गया हूँ
तेरी यादों से 
लड़ लड़के
जख़्म का असर कहा 
तेरी मोहब्बत में इसकदर बेपीर 
बन गया हूँ
फासलों में रह कर
जो राहगीर बना ,मनो
दरम्यां में ही कही ग़ुम हो गया हूँ
Continued
28th April, 2016

Sunday, 24 April 2016

चलो चले हम तुम वहाँ
सुबह भी हसीन हो रात सा जहाँ
दर्द क्या, ख़ामोशी की भी
न हो कोई निशां
अँधेरा भी उजालों सा हो जहाँ

चेहरों पे एक अलग सा नूर हो
तिनकों के सहारे न कोई मज़बूर हो
इनायत के न पहरेदार हो
ख़ुशनुमा हो हर पल जहाँ
चलो चले हम तुम वहाँ

भेद भाव का न रिश्ता वहाँ
मिलते हो बस प्यार जहाँ
दूरियों का न फासला हो
हम-तुम जी सके पल सुकूँ के जहाँ
चलो चले हम तुम वहाँ

हर कोई रहना चाहे वहाँ
सुक़ून के पल हो दरम्यां
दोस्ती की न करनी पड़े
पहचान जहाँ
चलो चले हम तुम वहाँ

:-Binodanderson
13th April, 2016
आज ख़ुदा भी ख़ामोश है
जुवां पे छलकते थे जो
भावना की तरंगे,
मौसम के आगे बेबस
लाचार है
मानों जिंदगी टहनी-सी हो गई है
हवा का थपेड़ा हो या
मौसम का मिज़ाज़
हर कोई सत्ता जाता है
किरणे हो या बारिस की बुँदे
ख़ुशी कम यातना ज्यादा दे जाता है
मधुर मन-मोहक ताज़गी तो बस
पल का मज़ाक हो गया है
मगर
ख़ामोशी,दर्द,अवसाद
उकेर कर ज़हर घोल जाता है
जिंदगी जीने की उधेड़ बुन में
ह्रदय और मन विकृत होकर
द्वन्द करता है
कुछ अच्छा करने की अभिलाषा में
प्रकृति की अनमोल वरदान को
यूँही गवांते जा रहे है
मनो दर्द की परछाई अपनी
पांव ज्यादा पसार रही हो
अंधकार सा जीवन व्यतीत हो रहा है
और हावी होता जा रहा है
आख़िर कहाँ गया वो नाज़ुक हाथों
का ख़िलौना
कहाँ रह गई हमारी हंसी
क्यों रूठ गई आशाएं
क्यों बढ़ रहा है अवसाद
आख़िर क्या पाना था
और क्या पाना चाहिए
मौत की सजी दुकान
भी पास है
मगर वो भी नही मिलती
दूर रह कर
व्यंग कस रही है
हमारे विचित्रता का आनन्द ले रही है
हमें परेशान देखकर
पूछ रही है
क्या इसलिए तू आया है यहाँ
व्याकुल असंतोष,द्वन्द लेकर मरने
नाज़ुक पल
कब का खत्म हो गया
अब तो पूरी ज़िन्दगी
इन्ही दर्द या उमीद में जीना होगा
नया सवेरा नये शहर
नया आशियाँ या उमीद भर के
मज़बूत या कठोर बनके
अपनी परिस्तिथियों से लड़ना होगा
ख़ामोश रह कर ही सही
जीतना होगा
-24th June15
Harnichak Patna
1:23 AM

सारे गिले शिक़वे


सारे गिले शिक़वे
यूँ इख़्तियार ले रहे है
मनो दिल, दिमाग़ से
पत्राचार कर रहे है
सारे गिले..........

ज़िन्दगी के आयाम में
तेरी न मौजूदगी परेशां कर रहे है
पहले यूँ ही ख़ाम हो जाता था
अब तेरी आहटों का इंतज़ार कर रहे है
सारे गिले.............

मैं भी नहीं चाहता था औरों की तरह
फिर भी इसमें सरीक हो रहे है
हर वादा और इरादा
डूबती कस्ती पे अब सवार हो रहे है
सारे गिले............

मोहब्बत का शुक्रिया करू या ख़ुदा का
आज भी
आँखों के आँसू मुझसे कितना प्यार कर रहे है
तुझसे बिछड़ के जिंदगी बदरंग हो जायेगी
इसलिए आज भी उनका इंतज़ार कर रहे है
सारे गिले...........

ऐसा नहीं है की प्यार ख़त्म हो गया है
बस अपनी झूठी उम्मीद को बरक़रार रख रहे है
कहीँ ये जिंदगी ज़िल्लत से दम न तोड़े दे
इसलिए आज भी हम आपसे प्यार कर रहे है
सारे गिले.................

Binod Anderson
30th-Nov-13
Patna

Friday, 8 April 2016

रहने दो



             
ख़ामोशी को ख़ामोश
रहने दो
गमों को एहसास
होने दो
मुसीबतों का बरसात
सहने दो
अपनी इनायतों का असर
बस मेरे साथ रहने दो
दुश्मनों को मदहोश
होने दो
आग और पानी का कहर
सहने दो
प्रकृति को भी कसर
करने दो
बस मुझे खुद में
ढलने दो
माना की गलतियों करता हूँ
छोड़ इंसाफ,
मेरे साँस में साँस
रहने दो
ये ज़िस्म जिगर सब तेरा है
बस धडकनों का एहसास
रहने दो
पूरा ढल चूका हूँ तुझमे
बस खुद को तुझमे जिने का
प्यास रहने दो
                                   :- 3/4/2016
                                                            delhi

मोहब्बत क्या है ?



मोहब्बत क्या है ?
आवारगी ,दीवानापन
या संस्कृति या संस्कार
औचित या अनुचित प्रतिकार
इज़हार या दरार
प्रकृति या तिरस्कार
अगर आत्माओं का मिलन है
तो समाज क्यों नहीं कर रहा स्वीकार
क्यों छुब्द है समाज
कहा गया वो राधा-कृष्ण की लीला
क्यों करते है गुणगान
क्यों ढोल-मंजीरा बजा कर
बढ़ाते अपनी शान
क्यूँ मीरा की धुन सुन खुश हो जाता इंसान
क्यूँ पाखंड-सा है व्यवहार
सामने मुस्कुराहट ,पीछे है धिकार
मोहब्बत क्या .....
समाज इसको जटिलता में पिरो कर
दर्द की करवाहट से साना है
राधा-कृष्ण क्या करे
वो तो खुद स्तब्ध है
देखकर यह व्यवहार
आखिर कैसा है समाज का प्यार
दोमुहां है अवतार
ख़ामोश तमाशा देख
देते स्टार चार
इसलिए आज भी है
हम सब में है अंधकार
ढोंग छल से ओत प्रोत
अपनी सखी करते बघार
प्रकृति के शीतल अमृत का
हमेश करते बहिष्कार
इसलिए आज भी हम सब में अंधकार
क्या है ...........

                   :-21st July2015
                                         1:35 AmPatna