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Friday, 8 April 2016

रहने दो



             
ख़ामोशी को ख़ामोश
रहने दो
गमों को एहसास
होने दो
मुसीबतों का बरसात
सहने दो
अपनी इनायतों का असर
बस मेरे साथ रहने दो
दुश्मनों को मदहोश
होने दो
आग और पानी का कहर
सहने दो
प्रकृति को भी कसर
करने दो
बस मुझे खुद में
ढलने दो
माना की गलतियों करता हूँ
छोड़ इंसाफ,
मेरे साँस में साँस
रहने दो
ये ज़िस्म जिगर सब तेरा है
बस धडकनों का एहसास
रहने दो
पूरा ढल चूका हूँ तुझमे
बस खुद को तुझमे जिने का
प्यास रहने दो
                                   :- 3/4/2016
                                                            delhi

1 comment:

  1. Awesome poem.. Keep writing continuously... All the best..

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