ज़िंदगी में उलझनों से भरा हूँ
दोहरी मोड़ पे खड़ा खड़ा हूँ
गम की चादरों को लपेटे
ख़ुशी के इंतज़ार में पड़ा हूँ
ज़िंदगी में..............
उथल-पुथल ,नोंक-झोंक से सना हूँ
आँधियों से,आँधियों के बीच लड़ा हूँ
पर ,वक्त ने बेवक्त ऐसा कर डाला
इस मझधार में ,अकेला खड़ा हूँ
ज़िंदगी में..............
रह में राहगीर बना हूँ
दर्द में भी तना हूँ
ज़िंदगी के कुंठित खेल में
मनो ,मैं मर ही गया हूँ
ज़िंदगी में..............
हर बार मेरी इन्तहा क्यूँ होती है
न चाह के भी इसमें हर-बार पड़ा हूँ
क्या हम जैसों का ज़िदगी बनाने का हक़ नहीं है
तो इस ज़िंदगी के धार में ,मैं ही क्यूँ खड़ा हूँ
ज़िंदगी में..............
16th-oct-12
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