शिकवा किन से करू
अपने बदकिस्मती का
गैरों ने तो खारोचा ही
दोस्तों ने वादा तोडा दोदोस्ती का
बमिश्किल से मिला था
दोस्ती का सहारा
नाव को ले जाकर मझधार में
साथ छोड़ दिया हमारा
कुछ कमी रह गई थी दोस्ती में
जो इस कदर रूठ गए हमसे
अभी तो खिले ही काटों में
फिर क्यों दर गए फूलों से
आप को साथ न देना था हमारा
तो यह राह बताया ही क्यों
मुझसे जब आपको दुश्मनी करना ही था
तो आप मुझे देख मुस्कुराये ही क्यों
मैंने तो सब कुछ दोस्ती के दाव पर लगाया
एक आप है जो मुझे दिन-रात तड़पाया
तड़पाने से भी रास न आया तो
चलते रस्ते में भी कुआ खोद्वाया
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