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Tuesday, 13 March 2012



हर जगह बदनाम है हम
        दिन में भी रात है हम
ऐसी कोई बारात नहीं
        जीते जागते लाश है हम
दुनिया में पहचान नहीं
        मेरे जीवन का कोई रास नहीं
करूँ क्या पहचान बनाने में
        दोस्त का भी साथ नहीं
जी तो करता है कुछ कर जाऊ
        गम तो बहुत है ,कही सुधरते-2 न मर जाऊ
दिलशाद न रहता है मेरा मन
        हंसता है मेरा बाह्य तन
करूँ क्या समझ न आये
        बस में नहीं है मेरा चंचल मन
        






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