क्या कहु
कैसा हो गया हूँ
खिल गया हूँ
या उदास हो गया हूँ
क्या कहू
इक ज़िंदगी है
अनन्त इक्षाये
एक पूरी हो रही है
तो दूसरी खाश हो गया हूँ
क्या कहु
मेरा कसूर है या किस्मत का
अपनी ज़िंदगी तो सुर्ख है मानो
मरुस्थल का प्यास हो गया हूँ
हर बार साफ नज़र आता है मंज़िल
पास आते आते हताश हो गया हूँ
क्या कहू
हजार प्रश्न है पूछने को
आख़िर कहाँ कमी है
जो दर के करीब आके छुट जाता है
कोशिशें नाक़ाम होती जा रही है
इस तरह हर गम का आफ़ताब हो गया हूँ
क्या कहु......
-Binodanderson
12:11AM ,2nd August 16
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