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Monday, 1 August 2016

क्या कहु
कैसा हो गया हूँ
खिल गया हूँ
या उदास हो गया हूँ
क्या कहू

इक ज़िंदगी है
अनन्त इक्षाये
एक पूरी हो रही है
तो दूसरी खाश हो गया हूँ
क्या कहु

मेरा कसूर है या किस्मत का
अपनी ज़िंदगी तो सुर्ख है मानो
मरुस्थल का प्यास हो गया हूँ
हर बार साफ नज़र आता है मंज़िल
पास आते आते हताश हो गया हूँ
क्या कहू

हजार प्रश्न है पूछने को
आख़िर कहाँ कमी है
जो दर के करीब आके छुट जाता है
कोशिशें नाक़ाम होती जा रही है
इस तरह हर गम का आफ़ताब हो गया हूँ
क्या कहु......
              -Binodanderson
                12:11AM ,2nd August 16

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