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Saturday, 27 August 2016

ये ख़ुदा

ये ख़ुदा
मुझे भी अब ठेहरा दे
थक चूका हूँ दर बदर से
अब अपना सेहरा दे
मेरी सुखी सरज़मीं को
अब एक नई कलम का मिशरा दे
ये ख़ुदा........

अब तक भीड़ में तन्हाई थी
अब पूरा मुक्कमल जहां दे
चुप चाप सहता रहा जो तूने दिया
अब मुझे मेरे हिस्से की ख़ुशियाँ दे
ये ख़ुदा...........

दर्द दिया मुज़सिर में भी न शहर किया
क़बूल मुझे हर मंज़र तेरा, अब रहमें कर्म दे
आधी ज़िंदगी गुज़र गई आपके आफ़रीन को
मेरे रजनी को इनायतों का शहर दे
ये ख़ुदा ............

थक चुका हूँ अब इन रहबेरों से
मुझे सड़क का पता नहीं, अब शहर दे
इस अंधकार के रौनक रौशनी में
अब उजालों का पहर दे
ये ख़ुदा......
        -binodanderson
         23:59 (27/08/16)

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