ये ख़ुदा
मुझे भी अब ठेहरा दे
थक चूका हूँ दर बदर से
अब अपना सेहरा दे
मेरी सुखी सरज़मीं को
अब एक नई कलम का मिशरा दे
ये ख़ुदा........
अब तक भीड़ में तन्हाई थी
अब पूरा मुक्कमल जहां दे
चुप चाप सहता रहा जो तूने दिया
अब मुझे मेरे हिस्से की ख़ुशियाँ दे
ये ख़ुदा...........
दर्द दिया मुज़सिर में भी न शहर किया
क़बूल मुझे हर मंज़र तेरा, अब रहमें कर्म दे
आधी ज़िंदगी गुज़र गई आपके आफ़रीन को
मेरे रजनी को इनायतों का शहर दे
ये ख़ुदा ............
थक चुका हूँ अब इन रहबेरों से
मुझे सड़क का पता नहीं, अब शहर दे
इस अंधकार के रौनक रौशनी में
अब उजालों का पहर दे
ये ख़ुदा......
-binodanderson
23:59 (27/08/16)
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