पल पल में
हर लम्हा गुज़र रहा
ख़ामोश रहूँ या लड़ता रहूँ
पर वक़्त का ये सेहरा पहर रहा
पल पल........
सोचता हूँ
ये मैं क्या कर रहा
कल की चाह में
आज क्यूँ बिखर रहा
पल पल ..........
सवाल मेरा नहीं ज़माने का है
ख़ुद को ऊपर जो कर रहा
तेरे हर काम से वो नाराज़ रहे
चाहे लाख कोशिश क्यूँ न कर रहा
पल पल ..........
जिंदगी आधी गुज़र गई
फिर भी मैं (दूसरी छोड़ पे)
ईंट आज भी रख रहा
मालूम मुझे भी है
हर ईंट पे ईंट कम हो रहा
पर क्या करूँ
ज़माने की सोहबत में ख़ुद को ज़िला रहा
पल पल ........
-Binodanderson
18/08 /16
22:51
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