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Thursday, 20 October 2016

धुप बदला है

धुप बदला है
छांव बदला है
बाहर आके देखो
जिंदग़ी का स्वरूप बदला है

मौसम की नमी में भी दर्द होता है
महसूस करने वालों का मिज़ाज़ बदला है
पहले पिट दो हम देख लेंगें
बस कहने वालों का स्टेज बदला है

मिट गई है इंसानियत
बस इंसान का रूप बदला है
मर रहे हो तो मरो , हमारा क्या
अब तो सबों का तहज़ीब बदला है

झूठी शानों-शौक़त में लिप्त है इंसान
माँ - बाप को देखने का क़िरदार बदला है
रात हो या दिन परवाह नहीं पालने में जिनको
आज उन्हीं के लिए घर बार बदला है

धर्म के नाम पे लाखों खर्च करते है
ग़रीबो को देख इंसानियत न पिघला है
पब हो या बार उड़ाते दिलखोल के यार
मग़र ठण्ड रात में खड़ा बेचारा पे ज़ुबां का इस्तेमाल बदला है

अंदर फ़र्क़ नहीं 30ml की
बहार ₹10में संसार बदला है
देख लो समाज का आईना, कमज़ोर की जात नहीं देखते
बस शासन का झंकार बदला है

कोई फ़र्क नहीं अगर तुम अमीर हो
मंदिर हो या मस्जिद सबका ईमान बदला है
ग़रीब का क्या ,वो तो खाते सोते परेशान
उनका तो बस मेज़बान बदला है

मरने से पहले कितना हाय तौबा करते
श्मशान में मेहमान बदला है
हर चीज़ है उनकी बनाई
लेकिन आज भी समाज में रहने का उनका स्थान बदला है
धूप बदला है
छांव बदला है

    -Binodanderson
     01:19AM (20/10/16)

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