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Saturday, 8 October 2016

मुझें अब किसी पे ऐतबार न रहा
हद से ज़्यादा किसी से प्यार न रहा
शांत हो गई है ये दरियां ये दीवारें दो ख़त
अब समय का क्या करे मुझे तो किसी का इंतज़ार न रहा

ये कसमे वादे सब झूठे लगते है
इस जिंदगी का क्या करे जिसका कोई सार न रहा
बहुत टूट कर चाहा था मैं भी किसी को
अपनी तो जिंदगी मौत से भी बतर है
अँधेरे में अंधकार न रहा
मुझे
            
ख़ुदा भी न दरियादिली दिखाई
अब तो ख़ुद से भी प्यार न रहा
दूसरे मुझसे क्या उम्मीद करे
मुझे तो अपनों का भी ऐतबार न रहा
मुझे
       - Binodanderson
               29/09/16(11:10AM)
               Traveling to delhi(near to Aligarh )

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