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Monday, 10 October 2016

तेरे पैरों की

तेरे पैरों की आहट
कहाँ से आ रही है
जबकि न तुम जा रही हो
न आ रही हो

ख़ामोश है तन मेरा
फिर भी तेरी खुशबु से मदहोश हो रहा हूँ
जबकि न तेरी शिनाख़्त है कही
न तुम आ रही हो

बेपीर ज़िस्म धड़क रहा है
आज भी तेरे साँसों से
जबकि न तुम दूर हो रही हो
न पास आ रही हो

न जाने कितनी मोहब्बत हो गई है
मेरे इस ताब्सिर आफताब को
न अँधेरा छट रहा है
न तुम मुस्तकबीर हो रही हो

तेरा अक्स है मुझमे या
मैं ही खो गया हूँ
आज भी इन निग़ाहों को इंतज़ार है तेरा
इनायतों का रहम है कि तुम आ रही हो
तेरे पैरों .......
     -Binodanderson
      09/10/16(1:05AM) M. nagar

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