ज़िन्दगी के इल्म न समझ सके
कोई फ़रियाद न थी
न कोई गिला सिकवा ख़ुदा से
फिर भी मज़बूरी का लात न समझ सके
ज़िंदगी का इल्म
हम अपनी मेहनत में मशगूल से थे
बस उनकी तबियत का मिज़ाज़ न समझ सके
तक्करर तो बहुत है उनसे फिर भी
शायद अपनी ही हालात को न समझ सके
ज़िंदगी के इल्म
आख़िर चाहता क्या है तू मुझे ये तो बता
रोने की इतलाह में आँखे न भींगा सके
कुछ भी सोचता ही हूँ ,ऐसा हालात हो जाता है
की लगता है अपनी औक़ात को न समझ सके
ज़िंदगी के इल्म
अब तो बस अब चूका हूँ झूठी ज़िंदगी जीने से
बांजड़े इश्क़ में एक कलियां न खिला सके
सोचता था क्या क्या करूँगा अपने जीवन में
मगर अपने समय के फिसलती रेत न पकड़ सके
जिंदग़ी के इल्म
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