तू ग़ैर की न थी
तो ग़ैर हो गई
तू दूर क्या गई
अपनी क़िस्मत भी बैर हो गई
मुक़म्मल जहाँ अपना होता
अब तो काश की ज़िंदगी शहर हो गई
क्या कहूँ तुझे या ख़ुदा को
जब अपने ही अपनों कि तोहमत हो गई
-Binodanderson
25th May17 (11:04)
Traveling to Delhi
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