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Sunday, 16 April 2017

न जाने इतिहास का आँचल
क्या झेला है
न जाने कितने मासूम को
नर्क की आग में ठेला है
वो सुबह की इंतज़ार में
न जाने कितने जन्मों का बाकी मैला है
तुम आज फिर वही करने चले हो
जहाँ खून की नदियां दौड़ा हो
प्यार की जिगर नफ़रत फैला हो
कितनो की सुबह की शाम हुई
कितनो बेटी गुलाम हुई
कितनो की मांग श्मशान हुई
कितनो की ख़ाकी की शाम हुई
इन लाखों की खून से सलाम हुई
आज फिर वही हम करते है
तुम इंसानियत को भूल के
धर्म संस्कृति की बात करते हो
मुहब्बत जहाँ बस्ता था
सुबह तेरे घर की रोटी
शाम को मेरे घर रुख़सत सलाम हुई
आज दिलों में शाद नही
क्योंकि आपकी अपनी कोई आवाम नही
झुकते हो उनके आगे जो न कभी
आपके और हमारे काम हुई
नज़रों को इंसानियत से देखो
धर्म तो इनकी उपज़ बोटों की निशान हुई
याद करो तुम उनको भी (APJ)
जिनकी मंदिर से पहचान हुई
कोई धर्म कष्ट क्रोध नही सिखाता
प्यार ही सबका गुरु ज्ञान हुई
वक़्त रहते संभल जाओ
नहीं तो मुकमल अपनी मिट्टी भी खाम हुई
न जाने  
             -Binodanderson (1:58AM)
              17/04/17

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