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Friday, 14 April 2017

आज अखंडता की एकता
पे सवाल उठ रहे है
खाने खिलाने और मज़हब की छोड़ो
इश्क़ पे भी नकेल कस रहे है
संस्कृति और समाज के झूठे ठेकेदार
अपनी झूठी शान और प्रसार में
दूसरों पे अत्याचार कर रहे है
देखो ये दुनियां वालों होश में आओ
एक पहले ग़ुलाम थे अब ग़ुलामी की दीवार गढ़ रहे है
स्वतंत्रता तो अब भी क़िताबों में है
अब भी हम पास के करारों में रह रहे है
मत भूल आज हमारी बारी है कल आते देर नही
जब तुम भी हुक्मगारो के जुल्मों में तकरार कर रहे है

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