कितना कुछ बदल गया है
इस ज़िन्दगी के धुप छाँव में
ख़ामोश बेजुबां-सा
जो घर के किसी कोने में खड़ा था
अपने कोमल नन्हे पांव में
गाँव छोड़ बाहर निकलकर
जब पैर पसारा शहर के अरांव में
उससे क्या मालूम था बदल जायेगा सब कुछ
बस पल भर के ठहराव में
फिर कोशिश करके थोड़ा बदला
लोगो ने कह दिया (बदल गया तेरा लौंडा) ताव में
अब कैसे उनको समझाऊँ
नहीं ढीठ सा रह सकता
पछिया तूफान के पड़ाव में
समय के साथ अगर न बदला
तो मिल जाऊंगा किसी गटर के टांव में
फिर भी लोग समझ न पाते
घर जाने से (ढेरों मिलता ) जीने के सुझाव में
कैसे उनको कोई कहे
गुज़र गया वो ज़माना, जहां नौकरी होती थी पांव में
अब तरफ़ शैलाब खड़ा है
चाहे जन्म हो या मरण या शमशान के जलाव में
कितना कुछ बदल गया है
इस ज़िन्दगी के धुप छावँ में।
-Binodanderson
M.nagar (4/11/16)22:44
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Friday, 4 November 2016
इस ज़िंदगी के धुप छाँव में
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