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Tuesday, 18 August 2015

थक गया हूँ
ना-ना प्रकार से
अब पक गया हूँ
इस झुठी सरकार से
कब आयेंगे अच्छे दिन
इस उम्मीद व् इंतज़ार से
थक गया हूँ.......
कहाँ गए वो वादे सारे
कहाँ गए वो इस्तियार से
जिसने जनता का दिल जीता था
अपनी पाखंडी जुम्ले के व्यवहार से
थक गया हूँ..........
क्या गरीबी कम हुई
या बच गए ,महँगाई के मार से
क्या देश की उन्नति हुई
या दब गए Basic इंतजामात से
थक गया हूँ...........
हर कोई यहाँ आता जाता है
कुचल जाता (जनता) मान-मर्यादा को प्यार से
किसान हमारे ज़मीन तलाशते
सरकार ख़ुश है पत्र-पत्राचार से
थक गया हूँ..........
हर दिन कुछ अच्छा सुनता
रह जाता बस हवा के मार से
किसान बेचारे मायूस हो जाते
डर जाते प्रकृति व् सरकार के प्रहार से
थक गया हूँ.........
न उम्मीद से मिला है
न ही विद्या के ज्ञान से
नौ-जवान युवा भटक रहे है
पढाई और भ्र्ष्टाचार के मार से
थक गया हूँ.........
हर तरफ इक आस बनी थी
इस सरकार के प्रचार से
झुठ बुनियाद ढह गया
हमें क्या फ़ायदा ऐसी सरकार से
थक गया हूँ.......
सच्चा वादा अगर कम ही करता
तो भी जीतता प्यार से
सौ करोड़ की जनता के उम्मीद को
लात मार दी अपने अहंकार से
थक गया हूँ..............
देश को दो ही बनाते
युवा और किसान के धार से
उन्हीं को अब तक तिरस्कृत किया
अपनी नीति और धृत व्यवहार से
थक गया हूँ.............

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