वो समंदर भी
अब शांत हो रहा है
मुश्किलें दिन ब दिन
जो आम हो रहा है
कब तक चलता रहूँगा ख़ुद से ज़िरह करके
अब तो रहबेरे भी शमशान हो रहा है
कितनी दूरीयां नाप ली मैंने
फिर भी कस्ती पे अपना शाम हो रहा है
वो समंदर......
वो ज़ुनू वो दमख़्म
सब ख़ुद में लिप्ट के आसमान हो रहा है
अब तो पांव भी रुक कर सोना चाहता है
मग़र जान भी अपना परेशान हो रहा है
वो समंदर .....
Traveling to Secunderabad
22:16PM, Guntkal jn.
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