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Saturday, 16 December 2017

वो समंदर

वो समंदर भी
अब शांत हो रहा है
मुश्किलें दिन ब दिन
जो आम हो रहा है
कब तक चलता रहूँगा ख़ुद से ज़िरह करके
अब तो रहबेरे भी शमशान हो रहा है
कितनी दूरीयां नाप ली मैंने
फिर भी कस्ती पे अपना शाम हो रहा है
वो समंदर......
वो ज़ुनू वो दमख़्म
सब ख़ुद में लिप्ट के आसमान हो रहा है
अब तो पांव भी रुक कर सोना चाहता है
मग़र जान भी अपना परेशान हो रहा है
वो समंदर .....
         Traveling to Secunderabad
          22:16PM, Guntkal jn.

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